Severe Cyclone Montha ने भारत के तटीय राज्यों—ओडिशा, आंध्र और तमिलनाडु—में खतरे की स्थिति बना दी है। जानें ताजा अपडेट, तैयारी और बचाव के उपाय।
लेखक केहर राजपूत | प्रकाशन तिथि: 29 अक्टूबर 2025

क्या है Severe Cyclone Montha?
“मोंथा” (Montha) नामक यह चक्रवात बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न हुआ है और भारत के पूर्वी तटीय राज्यों — ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु — के लिए गंभीर खतरा बन गया है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इसे “Severe Cyclonic Storm” की श्रेणी में रखा है। यह चक्रवात समुद्र की सतह के अत्यधिक गर्म होने के कारण बना है, जो वर्तमान में 150–180 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल रहा है।
चक्रवात का उद्भव और मार्ग
यह तूफान अंडमान सागर के ऊपर 26 अक्टूबर 2025 को बना और धीरे-धीरे पश्चिम-उत्तर दिशा में बढ़ता हुआ बंगाल की खाड़ी के मध्य भाग में पहुंच गया।
IMD के अनुसार, यह चक्रवात 30 अक्टूबर तक ओडिशा के गोपालपुर या आंध्र के श्रीकाकुलम तट पर टकरा सकता है।
इसकी तीव्रता बढ़ने की संभावना है क्योंकि बंगाल की खाड़ी का तापमान 30°C से अधिक है, जो चक्रवातों के लिए आदर्श परिस्थितियाँ पैदा करता है।
प्रभावित राज्य और क्षेत्र
IMD की चेतावनी के अनुसार निम्नलिखित क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं:
- ओडिशा: गोपालपुर, पूरी, भुवनेश्वर, पारादीप
- आंध्र प्रदेश: श्रीकाकुलम, विशाखापट्टनम, काकीनाडा
- तमिलनाडु: नागपट्टिनम, चेन्नई तट
इन राज्यों में भारी बारिश, समुद्र में ऊँची लहरें, बिजली गिरने और तेज़ हवाओं की संभावना है। मछुआरों को समुद्र में न जाने की सख्त सलाह दी गई है।
मौसम विभाग की चेतावनी और तैयारी
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने रेड अलर्ट जारी करते हुए बताया है कि यह चक्रवात अगले 48 घंटों में अत्यंत गंभीर रूप ले सकता है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन बल (NDRF) की 35 टीमें तटीय जिलों में तैनात की जा चुकी हैं।
राज्य सरकारों ने समुद्री तटों से 1.5 लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है।
ओडिशा के मुख्यमंत्री ने कहा — “जनता की सुरक्षा हमारी पहली प्राथमिकता है। हम हर जिले में नियंत्रण कक्ष और राहत शिविर बना चुके हैं।”
वहीं आंध्र प्रदेश में स्कूल-कॉलेज अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए हैं।
जनता के लिए जरूरी निर्देश
IMD और राज्य प्रशासन ने नागरिकों के लिए कुछ महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं:
- घर के ढीले सामान जैसे टिन की छत, गमले, एंटीना आदि को सुरक्षित करें।
- आवश्यक चीजें — टॉर्च, बैटरी, सूखा भोजन, पानी — पहले से तैयार रखें।
- बिजली उपकरण बंद रखें और मोबाइल पूरी तरह चार्ज कर लें।
- सुनामी या ऊँची लहरों की स्थिति में तटीय इलाकों से तुरंत दूर जाएं।
- सरकार द्वारा जारी चेतावनी संदेशों को नजरअंदाज न करें।
सोशल मीडिया पर अफवाहों से सावधान
ऐसे हालात में कई फर्जी वीडियो और पोस्ट वायरल होते हैं। प्रशासन ने कहा है कि लोग केवल आधिकारिक स्रोतों जैसे IMD, NDMA, राज्य सरकार के ट्विटर हैंडल से ही जानकारी लें।
किसी भी गलत खबर को आगे न बढ़ाएं, क्योंकि यह राहत कार्यों में बाधा डाल सकता है।
वैज्ञानिक नजरिया क्यों बनते हैं ऐसे चक्रवात?
वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और समुद्र की सतह का बढ़ता तापमान इन चक्रवातों की आवृत्ति और ताकत दोनों को बढ़ा रहा है।
पिछले 10 वर्षों में भारत के पूर्वी तट पर 15 से अधिक बड़े चक्रवात आ चुके हैं — जिनमें फोनी (2019), यास (2021) और जवाद (2022) शामिल हैं।
“मोंथा” भी उसी क्रम का हिस्सा है, जो बताता है कि दक्षिण एशिया अब जलवायु संकट के केंद्र में है।
राहत और पुनर्वास कार्य
राहत एजेंसियाँ — NDRF, SDRF, और तटीय पुलिस — लगातार बचाव कार्यों में लगी हुई हैं।
सैकड़ों नावें और हेलीकॉप्टर तैयार रखे गए हैं ताकि बाढ़ या फँसे लोगों को सुरक्षित निकाला जा सके।
राज्य सरकारों ने आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं:
- ओडिशा हेल्पलाइन: 1077
- आंध्र प्रदेश हेल्पलाइन: 108
- तमिलनाडु हेल्पलाइन: 1070
दीर्घकालिक समाधान और पर्यावरण संरक्षण
चक्रवातों से निपटने के लिए सिर्फ आपातकालीन उपाय ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नीति भी जरूरी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तटीय इलाकों में मैंग्रोव पेड़ों की संख्या बढ़ाना और हरित तट रक्षा प्रणाली विकसित करना बहुत मददगार हो सकता है।
इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में जल निकासी व्यवस्था मजबूत करनी होगी ताकि भारी वर्षा से जलभराव न हो।
लोगों की प्रतिक्रियाएँ
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सरकार की तैयारी इस बार पहले से बेहतर है, लेकिन बिजली और नेटवर्क बाधित होने की चिंता बनी हुई है।
सोशल मीडिया पर लोग प्रार्थना कर रहे हैं कि नुकसान कम से कम हो और सभी सुरक्षित रहें।
निष्कर्ष
“Severe Cyclone Montha” सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हमें जलवायु परिवर्तन की गंभीरता की याद दिलाने वाली घटना है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में आपदा प्रबंधन में काफी सुधार किया है, लेकिन चुनौती अभी भी बड़ी है।
अगर हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलें, तो ऐसे संकटों का असर काफी हद तक कम किया जा सकता है।
